चार्जशीट समय पर नहीं हुई तो कब मिलेगी स्टेट्यूटरी (डिफ़ॉल्ट) बेल?

कानून पुलिस हिरासत और जांच के लिए समय तय करता है। अगर वो समय खत्म हो गया और चार्जशीट/रिपोर्ट मजिस्ट्रेट के पास नहीं पहुंची, तो कानून के तहत आरोपी को बेल पर रिहा किया जा सकता है, बशर्ते वह बेल दे देगा।

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एक आम स्थिति

मान लीजिए आपको गिरफ्तार किया गया और पुलिस स्टेशन ले जाया गया। पुलिस कहती है कि जांच में समय लगेगा। दिन बीतते हैं, लेकिन जांच की फाइल मजिस्ट्रेट को नहीं भेजी गई।

कानून क्या कहता है?

यहां बताये गए नियमों का हिस्सा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) में है। यह बताता है कि जब प्रारम्भिक छोटे समय में (धारा 58 के अनुसार) जांच पूरी नहीं हो पाती तो क्या होना चाहिए।

अगर थाने के अधिकारी को लगता है कि आरोप वाजिब है और जांच चौबीस घंटे में पूरी नहीं हो सकती, तो अधिकारी को तुरंत संबंधित डायरी प्रविष्टियाँ (diary entries) और आरोपी को नजदीकी मजिस्ट्रेट के पास भेजना होगा (धारा 187(1)).

जिस मजिस्ट्रेट के पास आरोपी भेजा जाता है, वह यह देख कर कि क्या आरोपी पहले से बेल पर नहीं है या उसकी बेल रद्द नहीं हुई है, प्रारम्भिक मौके पर “समय-समय पर” कुल मिलाकर पंद्रह दिन तक हिरासत की मंजूरी दे सकता है, ये पंद्रह दिन हिस्सों में भी हो सकते हैं, और यह आदेश चौबीस घंटे के बाद शुरू होने वाले चालीस या साठ दिनों की सीमा के भीतर ही होगा जैसा कि मामला हो (धारा 187(2)). अगर उस मजिस्ट्रेट के पास उस केस को ट्राई करने या ट्रायल के लिए कमिट करने का अधिकार नहीं है और वह आगे की हिरासत अनावश्यक समझे, तो वह आरोपी को उस मजिस्ट्रेट के पास भेजने का आदेश दे सकता है जिसके पास अधिकार है (धारा 187(2)).

मजिस्ट्रेट अधिक समय तक हिरासत की मंजूरी दे सकता है अगर वह संतुष्ट हो कि इसके पर्याप्त कारण हैं। पर कुल मिलाकर कोई भी मजिस्ट्रेट उन मामलों में जिनमें सजा मौत, आजीवन कारावास या दस साल या उससे अधिक का सजा है, 90 दिनों से ज़्यादा पुलिस हिरासत की मंजूरी नहीं दे सकता; और अन्य मामलों में 60 दिनों से ज़्यादा नहीं। इन 90 या 60 दिनों की समाप्ति पर, अगर आरोपी बेल देने के लिए तैयार और सक्षम है तो उसे बेल पर रिहा कर दिया जाएगा (धारा 187(3)).

स्पष्टीकरण I कहता है कि उप-धारा (3) में बताई गई अवधि खत्म होने के बावजूद आरोपी तब तक हिरासत में रहेगा जब तक वह बेल नहीं देता। मजिस्ट्रेट को हिरासत की मंजूरी देने के कारण लिखने होंगे (धारा 187(7)).

मजिस्ट्रेट तब तक पुलिस हिरासत में जांच की मंजूरी नहीं दे सकता जब तक आरोपी पहली बार व्यक्तिगत रूप से उसके सामने पेश न किया गया हो और बाद में हर बार जब तक आरोपी पुलिस हिरासत में है उसे व्यक्तिगत रूप से पेश किया जाता रहे; हालांकि मजिस्ट्रेट आरोपी को पेश करने पर ऑडियो‑वीडियो इलेक्ट्रॉनिक साधनों के जरिये भी न्यायिक हिरासत के विस्तार कर सकता है (धारा 187(4)).

ध्यान दें कि अगर आरोपी एक महिला है और उसकी उम्र अठारह साल से कम है तो हिरासत रिमांड होम या मान्यता प्राप्त सामाजिक संस्था में होनी चाहिए। कानून यह भी कहता है कि कोई व्यक्ति पुलिस हिरासत में पुलिस स्टेशन के अलावा किसी और जगह पर और न्यायिक हिरासत में जेल के अलावा किसी और जगह पर नहीं रखा जा सकता, सिवाय उस स्थान के जिसे केन्द्र या राज्य सरकार ने जेल घोषित किया हो (धारा 187(4) और उपबंध)।

अगर मजिस्ट्रेट चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट के अलावा कोई और है और उसने हिरासत की अनुमति दी है, तो उसे अपने आदेश की एक प्रति कारणों के साथ चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट को भेजनी होगी (धारा 187(8)).

अगर पास में कोई मजिस्ट्रेट उपलब्ध न हो तो?

अगर पास में कोई मजिस्ट्रेट नहीं है, तो थाने का अधिकारी डायरी प्रविष्टि भेजकर आरोपी को निकटतम एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के पास भेज सकता है, जिनपर मजिस्ट्रेट के अधिकार सौंपे गए हों। वह एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट लिखित कारण बताकर कुल मिलाकर सात दिन तक हिरासत की मंजूरी दे सकता है। उस सात दिन के बाद आरोपी को बेल पर रिहा कर दिया जाएगा, सिवाय उस स्थिति के जब कोई सक्षम मजिस्ट्रेट आगे हिरासत का आदेश दे चुका हो। एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के तहत बिताए गए दिन उप-धारा (3) में बताई लंबी सीमाओं की गणना में शामिल होंगे। एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को सात दिनों की समाप्ति से पहले केस रिकॉर्ड और डायरी प्रविष्टियाँ नजदीकी जुडिशियल मजिस्ट्रेट को भेजनी होंगी (धारा 187(6)).

अगर जांच में पर्याप्त सबूत नहीं मिलते तो?

अगर जांच के बाद थाने का अधिकारी पाता है कि मजिस्ट्रेट को भेजने के लिए पर्याप्त सबूत या शक के कारण नहीं हैं, तो अधिकारी को, अगर व्यक्ति हिरासत में है, उसे निर्देशानुसार बॉन्ड या जमानत बॉन्ड पर रिहा कर देना चाहिए। यह बॉन्ड इस बात की गारंटी है कि वह व्यक्ति उस समय मजिस्ट्रेट के सामने पेश होगा जब ज़रूरत पड़े (धारा 189).

अगर जांच में पर्याप्त सबूत या शक का आधार मिलता है, तो अधिकारी आरोपी को मजिस्ट्रेट के पास भेज देगा जो पुलिस रिपोर्ट पर संज्ञान ले सकता है और ट्राय या कमिट कर सकता है। अगर अपराध बailable है और आरोपी सुरक्षा देने के योग्य है, तो अधिकारी आरोपी की सुनवाई के लिए सुरक्षा लेकर भी छोड़ सकता है (धारा 190(1)).

समन मामलों में लंबी जांच के बारे में?

अगर मामला मजिस्ट्रेट के समक्ष समन‑मामला (summons‑case) है और गिरफ्तारी की तारीख से छह महीनों के अंदर जांच पूरी नहीं होती, तो मजिस्ट्रेट आगे की जांच रोकने का आदेश देगा। सिवाय उस स्थिति के जब जांच करने वाला अधिकारी मजिस्ट्रेट को समझा दे कि विशेष कारण हैं और न्याय के हित में जांच जारी रखना जरूरी है (धारा 187(9)).

सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge) जांच रोकने के आदेश को रद्द कर सकता है और आगे जांच कराने का निर्देश दे सकता है, साथ ही बेल और अन्य बातों के निर्देश दे सकता है, यदि वह इस बात से संतुष्ट हो कि आगे की जांच होनी चाहिए (धारा 187(10)).

मुख्य बातें

  • अगर 24 घंटे का समय बीत जाये, तो पुलिस को आरोपी और डायरी प्रविष्टियाँ नजदीकी मजिस्ट्रेट के पास भेजनी होंगी (धारा 187(1)).
  • मजिस्ट्रेट प्रारम्भिक दौर में कुल मिलाकर 15 दिन तक हिरासत मंजूर कर सकता है और आगे कुल सीमा 90 दिन (गंभीर मामलों में) या 60 दिन (अन्य मामलों में) तक बढ़ाई जा सकती है; इन सीमाओं की समाप्ति पर अगर आरोपी बेल दे देता है तो उसे रिहा किया जाएगा (धारा 187(2)–(3) और स्पष्टीकरण I)।
  • अगर पास में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट नहीं है तो एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट कुल मिलाकर 7 दिन तक हिरासत देगा; ये दिन लंबी सीमाओं में गिने जाएंगे (धारा 187(6)).
  • अगर जांच में पर्याप्त सबूत नहीं हैं तो थाने का अधिकारी आरोपी को बॉन्ड या जमानत बॉन्ड पर रिहा कर देगा ताकि वह मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश हो सके (धारा 189).

उल्लेखित कानून

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) — धारा 187 (Procedure when investigation cannot be completed in twenty‑four hours), धारा 189, धारा 190; संदर्भ धारा 58 और Chapter XXXV जैसा कि आधिकारिक पाठ में दिया गया है

आधिकारिक स्रोत

यह गाइड सिर्फ़ कानून के आधिकारिक शब्दों को आसान भाषा में समझाता है। अनेक मामलों में कोर्ट ने इन धाराओं की व्याख्या की है और वो अलग तरीके से लागू हो सकती हैं। ऊपर लिखा पद्यनक पाठों के अनुसार स्थिति बताई गई है, जैसा कि 3 नवंबर 2026 तक उपलब्ध है।

स्रोत: Official text (egazette.gov.in) (नए टैब में खुलता है)

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