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एक आम हालत
मान लीजिए एक किरायेदार नगर निगम कार्यालय से बिल्डिंग प्लान की कॉपी माँगता है। कार्यालय हफ्तों तक जवाब नहीं देता। या दुकान वाले को कहते हैं कि फाइल किसी दूसरे विभाग में है और कुछ नहीं होता। ऐसी रोजमर्रा की परेशानियों के लिए यही कानून बना है।
कानून क्या कहता है?
पहली बार जब इस कानून का नाम आए तो इसे ऐसे लिखें: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005).
यह कानून बताता है कि कोई व्यक्ति किसी सार्वजनिक प्राधिकारी से जानकारी कैसे माँग सकता है और वह प्राधिकारी अनुरोध मिलने पर क्या करे। प्राधिकारी से कहा गया है कि वह “जितनी जल्दी हो सके” फैसला करे और किसी भी हाल में अनुरोध मिलने के तीस दिन के भीतर। अगर जानकारी किसी व्यक्ति के जीवन या आज़ादी से जुड़ी हो, तो 48 घंटे के अंदर देनी होगी। अगर तय समय के भीतर निर्णय नहीं दिया गया, तो अनुरोध को अस्वीकार माना जाएगा।
कानून कुछ खास तरह की जानकारी न देने की बात भी करता है। इनमें भारत की संप्रभुता और अखंडता, विदेशी राज्यों के साथ संबंध, तीसरे पक्ष के वाणिज्यिक रहस्य और व्यापारिक गोपनीयता, निजी जानकारी जो सार्वजनिक रुचि वाली नहीं है, और कैबिनेट की फाइलें शामिल हैं (हालाँकि मंत्रिमंडल के निर्णय और कारण उस मामले के पूरा होने के बाद सार्वजनिक हो जाते हैं)। लेकिन अगर सार्वजनिक रुचि उस संरक्षण से ज्यादा भारी है तो कानून जानकारी खोलने की अनुमति देता है। (धारा 8)
मैं जानकारी कैसे माँगूं और अनुरोध किस फॉर्म में होना चाहिए?
- अनुरोध लिखकर या इलेक्ट्रॉनिक रूप से English, हिन्दी या उस इलाके की आधिकारिक भाषा में किया जा सकता है। अनुरोध में मांगी गई जानकारी के बारे में साफ‑साफ बताना होगा। निर्धारित फीस देनी पड़ सकती है। (धारा 6)
- अगर कोई व्यक्ति लिख कर अनुरोध नहीं कर सकता, तो जन सूचना अधिकारी सभी जरूरी मदद करेगा और अनुरोध को लिख कर तैयार करेगा।
- आवेदनकर्ता को जरूरत से ज्यादा कारण नहीं बताने होते। बस संपर्क की जरूरी जानकारी देनी होती है।
- अगर जिस सार्वजनिक प्राधिकारी के पास जानकारी नहीं है पर किसी और प्राधिकारी के पास है, तो पहले प्राधिकारी को अनुरोध सही प्राधिकारी को जितनी जल्दी हो सके और किसी भी हालत में पांच दिन से अधिक नहीं लेते हुए ट्रान्सफर करना होगा और आवेदक को सूचित करना होगा।
नोट: अगर अनुरोध या अपील सहायक जन सूचना अधिकारी (Assistant Public Information Officer) को दी जाती है, तो जन सूचना अधिकारी के लिए दिए गए जवाब के समय में अतिरिक्त पांच दिन जुड़ जाते हैं।
सार्वजनिक प्राधिकारी के पास जवाब देने का कितना समय है, और फीस का क्या?
- जन सूचना अधिकारी को सामान्य तौर पर तीस दिनों में निर्णय देना होगा। पर अगर मामला जीवन या आज़ादी से जुड़ा है, तो 48 घंटे में। (धारा 7)
- अगर अधिकारी निर्णय कर देता है कि जानकारी दी जाएगी पर उसके खर्च के लिए ज्यादा फीस मांगता है, तो उस सूचना के भेजने और आवेदक के भुगतान के बीच का समय तीस दिन की सीमा से अलग माना जाएगा।
- अगर सार्वजनिक प्राधिकारी दिए गए समय में जानकारी नहीं देता, तो अनुरोधकर्ता को जानकारी मुफ्त में देनी होगी।
- कानून में कहा गया है कि फीस वाजिब होनी चाहिए और गरीबी रेखा के नीचे के लोगों से सरकार के निर्णय के अनुसार कोई फीस नहीं ली जाएगी।
अगर जानकारी मना कर दी जाए या तीसरे पक्ष का मामला हो तो क्या?
- अगर अनुरोध अस्वीकार किया जाता है, तो जन सूचना अधिकारी को अस्वीकार करने का कारण, अपील करने की अवधि और अपीलीय अधिकारी का पता बताना होगा।
- अगर मांगी गई जानकारी किसी तीसरे पक्ष से जुड़ी है या तीसरे पक्ष ने दी थी और उसने उसे गोपनीय रखा है, तो जन सूचना अधिकारी को पांच दिन के अंदर उस तीसरे पक्ष को लिखित नोटिस देना होगा और उसे लिखित या मौखिक रूप से अपना पक्ष रखने का मौका देना होगा। तीसरे पक्ष को नोटिस मिलने की तारीख से दस दिन के अंदर अपनी दलील रखने का मौका मिलेगा। (धारा 11)
- धारा 7 में जो कुछ भी कहा गया है, उसके बावजूद अगर तीसरे पक्ष को मौका दिया गया है तो जन सूचना अधिकारी को धारा 6 के अनुरोध मिलने के चौंदहवें दिन से नहीं बल्कि कुल मिलाकर चालिस दिनों के अंदर फैसला करना होगा और तीसरे पक्ष को अपने निर्णय का लिखित नोटिस देना होगा।
- अगर किसी रिकॉर्ड के कुछ हिस्से छूट के दायरे में आते हैं और कुछ नहीं आते, तो जहां संभव हो छूटी हुई बातों को काट कर बाकी हिस्सा दिया जाएगा। आवेदक को बताया जाएगा कि कौन‑सा हिस्सा दिया जा रहा है और बाकी हिस्सा क्यों नहीं दिया गया।
अपील कैसे संभाली जाती है और सूचना आयोग क्या कर सकता है?
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अगर व्यक्ति को तय समय में निर्णय नहीं मिलता या जन सूचना अधिकारी के निर्णय से खफा है, तो वह पहले वरिष्ठ पद के अधिकारी के पास तीस दिनों के अंदर अपील कर सकता है। यह अवधि समय की समाप्ति या निर्णय मिलने की तारीख से गिनी जाती है। वरिष्ठ अधिकारी आवश्यक समझने पर तीस दिनों के बाद की भी अपील स्वीकार कर सकता है। (धारा 19)
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दूसरी अपील सूचना आयोग (Information Commission) के पास उस तारीख से नब्बे दिनों के अंदर की जा सकती है जब निर्णय होना चाहिए था या निर्णय मिला। आयोग पर्याप्त कारण होने पर नब्बे दिनों के बाद की अपील भी स्वीकार कर सकता है।
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आयोग को अपील मिलते ही सामान्यत: 30 दिनों के अंदर निपटाना चाहिए। जब आवश्यकता हो और लिखित कारण दिए जाएं तो अधिकतम कुल 45 दिनों तक की बढ़त दी जा सकती है।
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किसी भी अपील में यह साबित करने की जिम्मेदारी जन सूचना अधिकारी पर रहती है कि अनुरोध ठोस वजह से रोका गया था।
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आयोग सार्वजनिक प्राधिकारी से जानकारी देने का आदेश दे सकता है, प्रक्रियाएँ बदलने को कह सकता है, जानकारी प्रकाशित करवाने का निर्देश दे सकता है, स्टाफ की ट्रेनिंग का आदेश दे सकता है, शिकायतकर्ता को नुकसान का मुआवजा दे सकता है, अधिकारियों पर जुर्माने लगा सकता है, या अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है। आयोग का निर्णय बाध्यकारी होता है।
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कानून यह भी कहता है कि अगर जन सूचना अधिकारी बिना सही वजह के आवेदन लेने से मना करे, तय समय में जानकारी न दे, दुर्भावनापूर्ण ढंग से अनिच्छा दिखाए, जान‑बूझकर गलत जानकारी दे, उस जानकारी से जुड़ी चीजें नष्ट करे या जानकारी देने में बाधा डाले तो जुर्माना लगेगा। जुर्माना रोजाना 250 रुपये के हिसाब से लगाया जाता है, अधिकतम 25,000 रुपये तक। जुर्माना लगाने से पहले अधिकारी को सुने जाने का मौका दिया जाएगा। (धारा 20)
मुख्य बातें
- अनुरोध लिखित या इलेक्ट्रॉनिक में English, हिन्दी या स्थानीय आधिकारिक भाषा में हो सकता है; लिख नहीं पा रहे हों तो मदद मिलेगी। (धारा 6)
- फैसला “जितनी जल्दी हो सके” और 30 दिनों में; जीवन/आज़ादी से जुड़ा हो तो 48 घंटे। (धारा 7)
- सार्वजनिक हित का तौलमोल होने पर छूट के बावजूद जानकारी दी जा सकती है; 20 साल से पुरानी कुछ जानकारी खुल सकती है जब तक खास छूट न लगे। (धारा 8)
- तीसरे पक्ष को नोटिस और दलील के लिए दस दिन; अगर उन्हें मौका दिया गया तो अधिकारी को अनुरोध मिलने के 40 दिनों के अंदर निर्णय देना होगा और तीसरे पक्ष को लिखकर सूचित करना होगा। (धारा 11)
- पहली अपील वरिष्ठ अधिकारी के पास 30 दिनों में; दूसरी अपील सूचना आयोग को 90 दिनों में; आयोग के निर्णय बाध्यकारी और सामान्यतः 30–45 दिनों में तय। (धारा 19)
- जन सूचना अधिकारियों पर बिना वजह मना करने या देरी करने पर जुर्माना: दिन‑प्रति 250 रुपये, अधिकतम 25,000 रुपये; आयोग अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है। (धारा 20)
संदर्भित कानून
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005) — धाराएँ 6, 7, 8, 9, 10, 11, 18, 19, 20, 21, 22, 23, 24, 26
आधिकारिक स्रोत
यह गाइड सिर्फ बताता है कि कानून में क्या लिखा है। कोर्ट के फैसले इन धाराओं की व्याख्या बदल सकते हैं और किसी खास मामले पर असर डाल सकते हैं। ऊपर दिए गए आधिकारिक टेक्स्ट के अनुसार यह स्थिति 1 November 2026 तक की है.