बैंक ने आपका लोन ARC को असाइन कर दिया — सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त पेमेंट और टाइटल डीड्स लौटाने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट (मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना) ने उधारकर्ता को पहले से दिए गए ₹250 करोड़ के अलावा अतिरिक्त ₹125 करोड़ देने का निर्देश दिया और कहा कि यह राशि मिलते ही टाइटल डीड्स वापस कर दी जाएँ।

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Legum Pacific ·

Suppose your factory loan is suddenly marked as non‑performing and the bank moves to sell the loan. You face SARFAESI notices, an insolvency petition and a web notice that the loan will go to an asset reconstruction company (ARC). The lender and the ARC then fight with you in several courts for years.

कानून क्या कहता है?

बैंक्स RBI की गाइडलाइन लागू करके खाते को Non‑Performing Asset (NPA) घोषित कर सकते हैं। बैंक अपने लोन को ARCs जैसी दूसरी संस्थाओं को ट्रांसफर (assign) भी कर सकते हैं। पहले के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने कहा है कि बैंक का कर्ज उसके पास संपत्ति की तरह होता है और बैंक वह संपत्ति ट्रांसफर कर सकता है। असाइनमेंट से बैंक के रिक्स वसूल करने का अधिकार असाइनी को मिल जाता है। उधारकर्ता के पास वही डिफेन्सेज रहती हैं जो बैंक के खिलाफ थे। Transcore judgment ने भी यह देखा कि SARFAESI Act के उपाय कुछ मामलों में DRT के उपायों के अतिरिक्त होते हैं।

यह विवाद में बैंक ने एक साथ कई रास्ते अपनाए: Debts Recovery Tribunal में रिकवरी की कार्यवाही, दिवाला और दिवालियापन संहिता, 2016 (Insolvency and Bankruptcy Code, 2016) के तहत NCLT में पिटिशन और SARFAESI अधिनियम (Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest Act, 2002) के तहत कदम।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला किया?

बेंच (मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना) ने Atibir Industries Co. Ltd. (उधारकर्ता), State Bank of India (लेनदार) और एक ARC (assignee) के बीच लंबी व्यावसायिक लड़ाई देखी। बैंक ने उधारकर्ता का खाता NPA कर दिया और कर्ज को ARC को ₹250 करोड़ में असाइन कर दिया था। NPA क्लासिफिकेशन और असाइनमेंट को हाई कोर्ट और इस कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने हर कानूनी सवाल पर निर्णायक तरीके से बात करने के बजाय व्यावहारिक रास्ता अपनाया। कोर्ट ने पूर्व न्यायाधीश माननीय श्री अनिल आर. डेव की डिटेल रिपोर्ट पर ध्यान दिया। उस रिपोर्ट ने चुकाए गए राशि का रिव्यू किया, बताया कि ARC को क्या एक रीजनेबल कमर्शियल रिटर्न माना जा सकता है और समझौते के लिए आंकड़े सुझाए।

लंबी लड़ाई को खत्म करने और संतुलन बैठाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने उधारकर्ता को ARC को अतिरिक्त ₹125 करोड़ देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने रिकॉर्ड किया कि यह ₹125 करोड़, पहले से दिए गए ₹250 करोड़ के साथ मिलकर, इन कार्यवाहियों में assignee के दावों का पूर्ण और अंतिम निपटान होगा। कोर्ट ने आदेश दिया कि अतिरिक्त राशि मिलने पर उत्तरदाता (respondents) टाइटल डीड्स वापस करें और जो भी सिक्योरिटी और गारंटी उनके पास हैं, उन्हें रीलीज़ कर दें। कोर्ट ने यह भी रिकॉर्ड किया कि NCLT और DRT में चल रही कार्यवाहियाँ इस समझौते के मद्देनजर निपट जाएँगी। NPA क्लासिफिकेशन और कुछ अन्य कानूनी सवालों पर कोर्ट ने फिलहाल कोई अंतिम फैसला नहीं किया।

आम लोगों, बिजनेस और गारंटर वालों के लिए इसका मतलब क्या है?

  • अगर बैंक लोन असाइन करता है, तो आम तौर पर असाइनी बैंक की जगह लेकर कर्ज वसूल करता है। उधारकर्ता के पास वही बचाव (defences) रहते हैं जो बैंक के खिलाफ थे।
  • कोर्ट्स कभी‑कभार व्यावसायिक समझौते करवा देते हैं ताकि चलती फर्म को काम जारी रखने दिया जा सके और असाइनी को मुआवजा मिल जाए। ऐसे समझौतों में लंप‑सम पेमेंट और पेमेंट मिलने पर टाइटल डीड्स वापसी शामिल हो सकते हैं।
  • बैंक एक साथ अलग‑अलग फोरम (DRT, IBC/NCLT और SARFAESI) में रिकवरी कर सकता है; ऐसे एक साथ कदम असाइनमेंट और क्लासिफिकेशन से जुड़े विवादों में पृष्ठभूमि का हिस्सा हो सकते हैं।

यह प्रक्रिया कितनी देर लेती है?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने जिस समझौते को मंज़ूरी दी, उसके लिए टाइमलाइन दी गई थी: उधारकर्ता को अतिरिक्त राशि 12 हफ्ते में देनी थी, और राशि मिलने के चार हफ्ते के अंदर उत्तरदाताओं को टाइटल डीड्स वापस करना और सिक्योरिटी रीलीज़ करनी थी। इस मुकदमे की अपनी लंबी कहानी रही है — कई साल अलग‑अलग फोरम्स में चली और फिर सुप्रीम कोर्ट के समझौते तक पहुँची।

मुख्य बिंदु

  • सुप्रीम कोर्ट ने पहले से चुकाए गए ₹250 करोड़ के अलावा अतिरिक्त ₹125 करोड़ देने का निर्देश दिया, और कहा कि यह पूरा और अंतिम निपटान माना जाएगा।
  • इस राशि के मिलने पर उत्तरदाताओं को टाइटल डीड्स लौटाने और सिक्योरिटी रीलीज़ करने का आदेश दिया गया।
  • कोर्ट ने तय नहीं किया कि NPA क्लासिफिकेशन या असाइनमेंट कानूनन सही था या नहीं; अगर समझौता पूरा नहीं हुआ तो ये सवाल वापस खुल सकते हैं।
  • यह केस दिखाता है कि कैसे लेनदार, ARCs और उधारकर्ता SARFAESI, DRT और IBC के तहत समानांतर कार्यवाहियों में उलझ सकते हैं, और फिर समझौते से मामला खत्म होता है।

स्रोत: Supreme Court of India (official judgment) (नए टैब में खुलता है) · Atibir Industries Co. Ltd. v. State Bank of India & Anr., C.A. Nos. 13916-13917 of 2026, 2026 INSC 1156

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