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मान लीजिए आपने फ्लैट बुक किया और अपनी बचत या होम लोन से किस्तें दीं। बिल्डर ब्रोशर दिखाता है, पैसा लेता है और कब्जे की तारीख वादा करता है। महिने या साल निकल जाते हैं और काम देर हो रहा है। आप अपने पैसों और आने वाली EMI को लेकर परेशान हैं।
कानून क्या कहता है?
रियल एस्टेट (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 2016 (Real Estate (Regulation and Development) Act, 2016) घर खरीदारों और प्रमोटरों के बीच के कॉन्ट्रैक्चुअल रिलेशनशिप को रेगुलेट करने के लिए बना। मकसद रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता और जवाबदेही लाना है। कानून प्रोजेक्ट रजिस्ट्रेशन की मांग करता है और प्रत्येक राज्य/केंद्रशासित प्रदेश में रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी, एडज्यूडिकेटिंग ऑफिसर और अपीलेट ट्रिब्यूनल बनाता है ताकि विवाद सुलझे। कानून तेजी से मामलों का निस्तारण चाहता है और घर खरीदारों को अनुचित प्रथाओं से बचाने का प्रयास करता है।
प्रोजेक्ट रजिस्ट्रेशन कैसे काम करता है?
RERA के तहत प्रमोटर को किसी भी विज्ञापन, मार्केटिंग, बुकिंग या बिक्री से पहले योग्य प्रोजेक्ट को रेगुलेटरी अथॉरिटी के साथ रजिस्टर करवाना जरूरी है। सरकारी सामग्री एक थ्रेशहोल्ड का उदाहरण देती है: 500 वर्ग मीटर से ऊपर के प्रोजेक्ट और आठ से अधिक अपार्टमेंट वाले प्रोजेक्ट आमतौर पर रजिस्ट्रेशन के लायक होते हैं।
रजिस्ट्रेशन पर प्रमोटर को प्रोजेक्ट की डिटेल देनी होती है। इनमें स्वीकृत प्लान, लेआउट प्लान, प्रोजेक्ट स्पेसिफिकेशन, एलॉटमेंट लेटर का प्रॉफॉर्मा, सेल का एग्रीमेंट और प्रस्तावित कॉन्वेयंस डीड शामिल हैं। प्रमोटर को यूनिट्स की संख्या और प्रकार, अपार्टमेंट और गैरेज का कार्पेट एरिया और प्रोजेक्ट पूरा करने की समय सीमा भी बतानी होती है।
प्रमो्टर को हर एडवरटाइज़मेंट या प्रॉस्पेक्टस में RERA रजिस्ट्रेशन नंबर ज़रूर बताना होगा। जो रियल एस्टेट एजेंट प्रोजेक्ट्स में डील करते हैं, उन्हें भी स्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी के साथ रजिस्टर होना होगा।
घर खरीदारों के लिए वित्तीय सुरक्षा क्या है?
RERA के तहत प्रमोटर को घर खरीदारों से एक प्रोजेक्ट के लिए जो रकम मिलती है उसका 70% अलग बैंक अकाउंट में रखना अनिवार्य है। यह पैसा सिर्फ उसी प्रोजेक्ट की कंस्ट्रक्शन और जमीन की लागत के लिए इस्तेमाल हो सकता है। इस अकाउंट से निकासी इंजीनियर, आर्किटेक्ट और चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा प्रोजेक्ट की प्रगति के प्रमाणन से ही जोड़ी जाती है।
कानून यह भी कहता है कि प्रमोटर खरीदार से डिपॉज़िट या एडवांस तभी ले सकता है जब पहले सेल के लिए एग्रीमेंट हो चुका हो। ये कदम फंड डाइवर्जन को कम करने और खरीदारों के दिए पैसों की रक्षा के लिए हैं।
मंत्रालय की प्रेस मटेरियल यह भी बताती है कि जो प्रमोटर बिना रजिस्ट्रेशन के प्रोजेक्ट का विज्ञापन, मार्केटिंग, बुकिंग या सेल करता है उसे दंड का सामना करना पड़ सकता है। प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि दंड प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत का 10% तक हो सकता है, जो रेगुलेटरी अथॉरिटी तय करेगी।
अगर डेवलपर कब्जा दे देने में लेट करे या वादे तोड़े तो क्या होता है?
अगर प्रमोटर सेल एग्रीमेंट की शर्तों के मुताबिक प्रोजेक्ट पूरा नहीं करता है, तो सरकारी मटेरियल में घर खरीदार के दो उपाय बताए गए हैं। घर खरीदार जमा की गई रकम ब्याज के साथ वापसी मांग सकता है। या फिर खरीदार हर महीने की देरी के लिए ब्याज का दावा कर सकता है जब तक कब्जा नहीं मिलता।
कानून यह भी कहता है कि प्रमोटर स्वीकृत प्लान, लेआउट प्लान या प्रोजेक्ट की स्पेसिफिकेशन को तब तक बदल नहीं सकता जब तक कम-से-कम दो-तिहाई अलॉटियों की लिखित सहमति न हो। इससे बिक्री के बाद एकतरफा बदलाव रुकता है।
RERA देरी पर ब्याज की दरों में समान व्यवहार का नियम भी रखता है: देरी होने पर प्रमोटर खरीदार को समान दर का ब्याज देना बाध्य है।
विवाद कैसे निपटते हैं और लागू करने के क्या साधन हैं?
हर राज्य/केंद्रशासित प्रदेश में एक रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी, एक एडज्यूडिकेटिंग ऑफिसर और एक अपीलेट ट्रिब्यूनल स्थापित करने हैं। सरकारी मटेरियल कहता है कि मामलों का निपटारा आवेदन या अपील की तारीख से साठ (60) दिन के भीतर करने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि तेज़ निपटान हो।
मंत्रालय की प्रेस रिलीज़ में यह भी कहा गया है कि अधिनियम की धारा 40 से प्रमोटर से अवैतित ब्याज, दंड या मुवावजा जमीन राजस्व के बकाए के रूप में वसूल किए जा सकते हैं। एडज्यूडिकेटिंग ऑफिसर, रेगुलेटरी अथॉरिटी या अपीलेट ट्रिब्यूनल के पास वसूली के लिए जरूरी ऑर्डर या निर्देश जारी करने की शक्ति है।
धारा 41 केंद्रीय सलाहकार परिषद (Central Advisory Council) स्थापित करती है जो केंद्रीय सरकार को लागू करने से जुड़े मुद्दों पर सलाह देगी, जिसमें घर खरीदारों के हितों की सुरक्षा भी शामिल है।
आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है?
अगर आपने किसी रजिस्टर्ड प्रोजेक्ट में फ्लैट के पैसे दिए हैं, तो कानून कुछ खास जानकारी और वित्तीय सुरक्षा देता है। प्रोजेक्ट की जानकारी खुलकर देनी होती है, भुगतान सिर्फ उसी प्रोजेक्ट के लिए इस्तेमाल होना चाहिए (70% नियम के अनुसार), और देरी होने पर उपाय उपलब्ध हैं। अगर प्रमोटर बिना रजिस्ट्रेशन के कोई प्रोजेक्ट बेचता या विज्ञापित करता है तो उसे भारी दंड झेलना पड़ सकता है, जैसा प्रेस मटेरियल में बताया गया है।
स्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी और एडज्यूडिकेटिंग ऑफिसर शिकायतें सुनने के लिए बनाए गए हैं। सरकारी मटेरियल इस ढांचे को पुराने विकल्पों की तुलना में तेज़ और पारदर्शी राहत देने वाला बताती है।
मुख्य बातें
- RERA कवर्ड प्रोजेक्ट्स को विज्ञापन, मार्केटिंग, बुकिंग या बिक्री से पहले रजिस्ट्रेशन कराना ज़रूरी करता है; 500 वर्ग मीटर से ऊपर या आठ से अधिक यूनिट्स वाले प्रोजेक्ट आमतौर पर रजिस्टर करने लायक हैं।
- प्रमोटर को रजिस्ट्रेशन पर बताई गई प्रोजेक्ट डिटेल्स देना अनिवार्य है और विज्ञापनों में RERA रजिस्ट्रेशन नंबर दिखाना होगा।
- प्रोजेक्ट के लिए जो रकम इकठ्ठी होती है उसका 70% अलग बैंक अकाउंट में रखना होगा और वह पैसा सिर्फ उसी प्रोजेक्ट और जमीन की लागत के लिए इस्तेमाल होगा; निकासी के लिए प्रोफेशनल सर्टिफिकेशन चाहिए।
- एग्रीमेंट फॉर सेल के बिना डिपॉज़िट नहीं लिया जाना चाहिए; रियल एस्टेट एजेंट्स को भी अथॉरिटी के साथ रजिस्टर करना होगा।
- अगर प्रमोटर पूरा करने में देरी करता है तो खरीदार रिफंड ब्याज के साथ मांग सकता है या कब्जा मिलने तक हर महीने के लिए ब्याज का दावा कर सकता है।
- मामलों का निपटारा 60 दिन के अंदर किया जाना लक्ष्य है; अवैतित ब्याज, दंड या मुवावजा धारा 40 के तहत जमीन राजस्व के बकाये के रूप में वसूला जा सकता है; धारा 41 के तहत केंद्रीय सलाहकार परिषद का प्रावधान है।
संदर्भित कानून
- रियल एस्टेट (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 2016 (Real Estate (Regulation and Development) Act, 2016) (जैसा कि दिए गए मंत्रालय/प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो स्रोतों में उद्धृत है)
- रियल एस्टेट (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 2016 — धारा 40 (अवैतित ब्याज, दंड या मुवावजे की वसूली को जमीन राजस्व के बकाये के रूप में) (जैसा कि दिए गए स्रोतों में उद्धृत है)
- रियल एस्टेट (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 2016 — धारा 41 (केंद्रीय सलाहकार परिषद) (जैसा कि दिए गए स्रोतों में उद्धृत है)
आधिकारिक स्रोत
यह गाइड बताती है कि कानून में जो लिखा है वही क्या कहता है। कोर्ट के फैसले इन प्रावधानों की व्याख्या बदल सकते हैं और किसी खास केस में लागू होने के तरीके पर असर डाल सकते हैं। यह ऊपर सूचीबद्ध आधिकारिक पाठों के अनुसार 24 October 2026 तक की स्थिति बताता है।
स्रोत: Official text (static.pib.gov.in) (नए टैब में खुलता है)