मोटर एक्सीडेंट में मुआवजा कितना मिलता है? सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला आसान भाषा में

सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2016 के एक स्कूटर हादसे से जुड़ी दो अपीलों पर फैसला सुनाया। कोर्ट ने functional disability (कमाने की क्षमता पर असली असर), मल्टिप्लायर तरीका और इंश्योरर को अतिरिक्त राशि ब्याज के साथ जमा कराने के निर्देश पर जोर दिया। पहले पक्ष को Rs.77,84,394 और दूसरे पक्ष को Rs.69,60,880 दिए जाने का आदेश हुआ।

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Legum Pacific ·

क्या हुआ?

अक्टूबर 2016 में एक सड़क हादसा हुआ। एक स्कूटर दूसरे स्कूटर से टकराया। कोर्ट ने कहा कि दूसरी स्कूटर तेज और लापरवाही से आ रही थी। दोनों अपीलकर्ता स्कूटर पर थे। दोनों नीचे गिरे और गंभीर चोटें आईं।

पहला दावा करने वाला पूरी तरह विकलांग हो गया। उसकी औरत ने अपील में उसे पेश किया। दूसरे दावे वाले को कई फ्रैक्चर और ब्राचियल प्लेक्सस (बांह तक जाने वाली नसों) की चोट लगी, जिससे हाथ को नर्व का असर हो सकता है।

कानून क्या कहता है?

जजमेंट में मोटर‑एक्सीडेंट क्लेम के आम सिद्धांत अपनाए गए:

  • नोटिय़नल इनकम (जब असली आय साबित न हो तो मानकर ली जाने वाली मासिक आय) कोर्ट तय कर सकती है।
  • मल्टिप्लायर मेथड (multiplier method) सालाना नुकसान को एकमुश्त रकम में बदलता है। मल्टिप्लायर का चुनाव claimant की उम्र पर निर्भर करता है।
  • मेडिकल डिसएबिलिटी (डॉक्टरों द्वारा प्रमाणित प्रतिशत) और functional disability (दिन‑प्रतिदिन और कमाने की क्षमता पर असली असर) में फर्क होता है। कोर्ट ने कहा कि functional disability मेडिकल प्रतिशत से ज्यादा भी हो सकती है अगर रोजमर्रा की जिंदगी और कमाई पर ज़्यादा असर पड़े।
  • एटेंडेंट या बाईस्टैंडर चार्जेज (देखभाल का खर्च) भी मल्टिप्लायर मेथड से निकाले जा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

यह जजमेंट न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया और न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी ने दी।

जजमेंट के प्रमुख निष्कर्ष और गणना:

  • पहले अपीलकर्ता (उम्र 43): कोर्ट ने नोटिय़नल मासिक आय Rs.15,000 मान ली। मेडिकल बोर्ड ने 75.5% मेडिकल डिसएबिलिटी प्रमाणित की थी, पर कोर्ट ने कहा कि कमाने की क्षमता पर असर (functional disability) 100% माना जाना चाहिए क्योंकि चोटें इतनी गंभीर थीं और उम्र भर देखभाल की जरूरत रहेगी। कोर्ट ने मल्टिप्लायर 14 लगाया। एटेंडेंट चार्जेज के लिए भी मल्टिप्लायर मेथड लगाया गया। भविष्य की चिकित्सा खर्च के लिए Rs.10,00,000 रखे गए। दर्द और जीवन की सुविधाओं के नुकसान के लिए भी जहाँ उचित था रकम बढ़ाई गई।
  • दूसरे अपीलकर्ता: मेडिकल बोर्ड ने 62% मेडिकल डिसएबिलिटी बताई थी; कोर्ट ने loss of earning capacity के हिसाब से functional disability 80% मानी। एटेंडेंट चार्जेज के लिए मल्टिप्लायर मेथड लगाया गया। इस मामले में loss of marriage prospects के लिए Rs.5,00,000 दिए गए। भविष्य के मेडिकल खर्च Rs.8,00,000 फिक्स किए गए।

अंतिम रकम और निर्देश:

  • कोर्ट ने कहा कि पहले अपीलकर्ता को कुल Rs.77,84,394 मिलना चाहिए और जजमेंट में बताए अनुसार अतिरिक्त रकम और ब्याज भी चुकाना होगा।
  • दूसरे अपीलकर्ता के हक में कुल Rs.69,60,880 का आदेश हुआ और जजमेंट में बताए अनुसार अंतर और ब्याज चुकाना होगा।
  • प्रतिवादी इंश्योरर को निर्देश दिया गया कि वह अतिरिक्त राशियाँ ब्याज सहित छह हफ्तों के भीतर संबंधित ट्रिब्यूनल के सामने जमा कराए।
  • ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया गया कि पहचान के प्रमाण माँगने के बाद राशि सीधे अपीलकर्ताओं के बैंक खातों में ट्रांसफर कर दे।

आम लोगों के लिए इसका मतलब क्या है?

  • अगर दावे वाला अपनी असल आय साबित नहीं कर सकता, तो कोर्ट नोटिय़नल आय तय कर सकती है और मल्टिप्लायर लगा कर भविष्य के नुकसान का एकमुश्त हिसाब कर देगी। यह उन लोगों के लिए जरूरी है जिनकी आमदनी अनौपचारिक है।
  • मेडिकल डिसएबिलिटी का प्रतिशत आखिरी बात नहीं है। कोर्ट functional disability देख कर ज्यादा मुआवजा दे सकती है अगर रोजमर्रा और कमाने पर असल असर हो।
  • लंबी देखभाल की ज़रूरत होने पर एटेंडेंट चार्जेज भी मल्टिप्लायर से जोड़े जा सकते हैं, न कि सिर्फ एक छोटी मासिक रक़म।
  • इंश्योरर को कोर्ट अतिरिक्त रकम जल्दी जमा करानी पड़ सकती है और ब्याज भी देना होगा।

मुख्य बातें

  • कोर्ट ने मेडिकल डिसएबिलिटी और functional disability में फर्क किया और जहाँ कमाने की क्षमता effectively खत्म हुई, वहाँ अधिक मुआवजा दिया।
  • नोटिय़नल इनकम और मल्टिप्लायर मेथड से भविष्य के नुकसान और एटेंडेंट चार्जेज के एकमुश्त दावे निकाले गए।
  • इंश्योरर को अतिरिक्त राशियाँ ब्याज सहित जमा करने का आदेश हुआ; ट्रिब्यूनल पहचान के बाद सीधे बैंक खाते में ट्रांसफर करेगा।

स्रोत: Supreme Court of India (official judgment) (नए टैब में खुलता है) · Sunil Kumar (Totally Disable Represented By Wife) v. Iffco Tokio General Insurance Company Ltd., C.A. Nos. 13542–13543 of 2026 (Arising out of SLP (C) Nos. 21292 and 21441 of 2026), 2026 INSC 1145

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