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एक आम हालात
मान लीजिए किसी गैर-बैलबिल अपराध की शिकायत हो गई है और आपको डर है कि पुलिस आपको गिरफ्तार कर सकती है। आप चाहते हैं कि पुलिस की पूछताछ के दौरान आपको हिरासत में न रखा जाए। कानून ऐसी स्थिति के लिए एक तरीका देता है — कि अगर किसी को गिरफ्तारी का अंदेशा हो तो वह पहले से कोर्ट से अरजी कर सकता है।
कानून क्या कहता है?
यहां पहली बार कानून का आधिकारिक नाम दिया जा रहा है: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023). यह संहिता कहती है कि जिसे यह आशंका हो कि उसे किसी गैर-बैलबिल अपराध के लिए गिरफ्तार किया जा सकता है, वह हाई कोर्ट या सेशन कोर्ट में धारा 482 के तहत अरजी कर सकता है। पाठ में कहा गया है कि कोर्ट “यदि उपयुक्त समझे तो निर्देश दे सकती है कि ऐसी गिरफ्तारी होने की स्थिति में उसे जमानत पर छोड़ा जाए।” धारा में यह भी कहा गया है कि ये पद्धति भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023) की धाराओं 65 और 70(2) के तहत होने वाली कुछ गिरफ्तारी पर लागू नहीं होती (धारा 482(4)).
कौन कर सकता है और कब?
जिसे ये कारण हो कि उसे किसी गैर-बैलबिल अपराध के लिए गिरफ्तार किया जा सकता है, वह पहले से हाई कोर्ट या सेशन कोर्ट में धारा 482(1) के तहत अरजी कर सकता है। क़ानून कहता है कि कोर्ट “यदि वह उचित समझे, निर्देश दे सकती है” कि गिरफ्तारी होने पर उसे जमानत दी जाए (धारा 482(1)).
हाई कोर्ट या सेशन कोर्ट कौन-सी शर्तें लगा सकते हैं?
धारा 482(2) में ऐसी दिशा-निर्देश देने पर लगाई जा सकने वाली शर्तें दी गई हैं:
- उस व्यक्ति को पुलिस अधिकारी की पूछताछ के लिए जब भी आवश्यकता हो, उपलब्ध होना होगा।
- वह व्यक्ति सीधे या परोक्ष रूप से किसी भी ऐसे व्यक्ति को प्रेरित, धमकी या वादा नहीं करेगा जो मामले के तथ्यों से परिचित है, ताकि वह उन तथ्यों को कोर्ट या किसी पुलिस अधिकारी को बताने से हतोत्साहित न करे।
- उस व्यक्ति को कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना भारत छोड़ने की इजाज़त नहीं होगी।
- वही अन्य शर्तें जो धारा 480 की उप-धारा (3) के तहत लगाई जा सकती हैं, जैसे कि अगर जमानत धारा 480 के तहत दी जा रही हो।
ये शर्तें संहिता में लिखी हुई हैं; कोर्ट इन्हें “मामले के तथ्यों की रोशनी में” लागू कर सकती है (धारा 482(2)).
निर्देश के बावजूद गिरफ्तार कर लिया गया तो क्या होगा?
अगर किसी ने निर्देश ले रखा हो और उस व्यक्ति को बिना वारंट के थाने के इंचार्ज ने पकड़ लिया, और वह गिरफ्तारी के समय या हिरासत में होते हुए भी जमानत देने के लिए तैयार हो, तो उसे जमानत पर छोड़ दिया जाएगा (धारा 482(3)). अगर कोई मजिस्ट्रेट मामले की सुनवाई करते समय तय करता है कि पहले वारंट जारी होना चाहिए, तो वो व्यक्ति के खिलाफ निर्देश के अनुरूप एक बailable warrant यानी जमानती वारंट जारी करेगा (धारा 482(3)).
इसी अध्याय में बॉन्ड और जमानतदार कैसे चलते हैं?
सन्हिता इसी अध्याय में बॉन्ड और जमानतदारों के नियम भी तय करती है:
- जो कोर्ट अपराध की सुनवाई कर रही है या अपीलेट कोर्ट है, वह आरोपी से यह माँग कर सकती है कि वह ऊपरी कोर्ट के समक्ष पेश होने के लिए बॉन्ड करे; ऐसा बॉन्ड छह महीने के लिए लागू रहेगा (धारा 481).
- हर बॉन्ड की रकम मामले की हालत के अनुसार तय की जाएगी और बहुत ज़्यादा नहीं होनी चाहिए। हाई कोर्ट या सेशन कोर्ट पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट द्वारा माँगी गई जमानत घटा भी सकती है (धारा 484).
- गिरफ़्तारी से पहले, उस रकम का बॉन्ड जो पुलिस अधिकारी या कोर्ट उचित समझे, आरोपी को देना होगा, और जमानत पर छुड़ाने पर एक या अधिक पर्याप्त जमानतदार भी चाहिए होंगे (धारा 485(1)). बॉन्ड का शर्त यह होगा कि व्यक्ति जरुरत के अनुसार हाज़िर होगा और आगे भी हाज़िर रहता रहेगा (धारा 485(1)–(3)).
- यह तय करने के लिए कि जमानतदार फिट या पर्याप्त हैं या नहीं, कोर्ट अफ़िडेविट स्वीकार कर सकती है या जांच करवा सकती है (धारा 485(4)). हर जमानतदार को कोर्ट के सामने यह भी बताना होगा कि उसने और किन लोगों के लिए जमानत दी हुई है (धारा 486).
- जैसे ही बॉन्ड पूरा हो जाता है, व्यक्ति को रिहा कर दिया जाएगा; अगर वह जेल में है तो जमानत देने वाली कोर्ट जेल के इंचार्ज को रिहाई का आदेश देगी (धारा 487).
- अगर गलती से कम जमानतदार स्वीकार कर लिए गये या बाद में वे अपर्याप्त हो गये, तो कोर्ट व्यक्ति को हाज़िर कराने का वारंट जारी कर सकती है और उसे पर्याप्त जमानतदार खोजने का आदेश दे सकती है या उसे जेल भेज सकती है (धारा 488).
- जमानतदार मजिस्ट्रेट से बॉन्ड से मुक्त होने के लिए अरजी कर सकते हैं; मजिस्ट्रेट आरोपी को हाज़िर कराने का वारंट जारी करेगा और नए जमानतदारों का निर्देश दे सकता है या आरोपी को जेल भेज सकता है (धारा 489).
- जिस व्यक्ति से बॉन्ड कराने के लिए कहा गया है, वह (अच्छे व्यवहार के बॉन्ड के मामले को छोड़कर) बॉन्ड करने के बजाय पैसा या सरकारी वाउचर जमा कर सकता है (धारा 490).
- यदि कोई बॉन्ड जब्त साबित हो जाता है तो कोर्ट उसके कारण रिकॉर्ड करेगी और बॉन्ड में बंधे किसी भी व्यक्ति से जुर्माना वसूलने या उससे कारण पूछने का आदेश दे सकती है (धारा 491(1)).
मुख्य बातें
- धारा 482 यह रस्ता देती है कि जो कोई गैर-बैलबिल अपराध में गिरफ्तार होने का डर रखता है, वह हाई कोर्ट या सेशन कोर्ट से पहले से कह सकता है कि गिरफ्तारी होने पर उसे जमानत पर छोड़ा जाए।
- संहिता कहती है कि कोर्ट “यदि वह उचित समझे, निर्देश दे सकती है” और इसमें उन शर्तों की सूची दी गई है जो कोर्ट लगा सकती है (धारा 482(1)–(2)).
- अगर निर्देश के बाद भी बिना वारंट गिरफ्तार हो जाता है और वह जमानत देने को तैयार हो, तो उसे जमानत पर छोड़ा जाएगा; अगर वारंट जारी करना ही होगा तो मजिस्ट्रेट निर्देश के अनुरूप जमानती वारंट जारी करेगा (धारा 482(3)).
- संहिता बॉन्ड की रकम, जमानतदारों, बॉन्ड के बदले जमा और बॉन्ड जब्ती के नियमों की विस्तृत व्याख्या भी देती है (धारा 481, 484–491).
संदर्भित कानून
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) — धारा 481
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) — धारा 482
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) — धारा 484
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) — धारा 485
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) — धारा 486
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) — धारा 487
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) — धारा 488
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) — धारा 489
आधिकारिक स्रोत
यह गाइड सिर्फ़ कानून के टेक्स्ट को आसान भाषा में बताता है। कोर्ट के फैसले भी यह तय करते हैं कि ये प्रावधान किसी खास केस में कैसे लागू होंगे। ऊपर दिए आधिकारिक पाठ के अनुसार स्थिति 19 October 2026 तक बताई गई है।
स्रोत: Official text (egazette.gov.in) (नए टैब में खुलता है)