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एक साधारण हालात में क्या हुआ?
सोचिए एक स्टेट डिपार्टमेंट में लंबे समय से काम करने वाला डेली-वेज़ स्किल्ड वर्कर 30 जून को रिटायर हो गया। अगले दिन यानी 1 जुलाई को सालाना increment (वेतन बढ़ोतरी) देनी थी। वर्कर का मानना था कि ये increment पेंशन और रिटायरल बेनिफिट में गिनी जानी चाहिए। नियोक्ता कहता है नहीं, वह “डेली वेजर” था। यही झगड़ा सुप्रीम कोर्ट तक गया।
कानून और पुराने फैसलों में क्या कहा गया?
उस सिद्धांत (ratio) को बाद में M. Siddaraj केस में भी लागू किया गया। उन फैसलों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि किस तरह से वे दिशा-निर्देश दूसरों पर लागू होंगे: एक हिस्सा यह कहा गया कि जो जजमेंट दिया गया है वह उसी तारीख से लागू होगा; दूसरे हिस्से में कहा गया कि जिन लोगों ने पहले से रिट याचिका दायर करके जीत ली है उन्हें res judicata का फायदा मिलेगा; और एक संशोधित दिशा में कहा गया कि जो लोग रिट याचिका या इंटरवेंशन दायर करते हैं, उन मामलों में पिछले तीन सालों के लिए एक increment शामिल करके पेंशन बढ़ाई जा सकती है।
गुजरात के केस में एक सरकारी संकल्प (Government Resolution) दिनांक 17 October 1988 महत्वपूर्ण है। उस संकल्प ने कुछ डेली-वेज़ स्किल्ड वर्कर्स को, जिन्होंने 1 October 1988 तक कम से कम दस साल की सर्विस पूरी कर ली थी, वेतन-स्केल और रिटायरल बेनिफिट के लिए स्थायी माना था। उस संकल्प ने उनकी सुपरएन्युएशन की आयु 60 साल तय की और कहा कि उस नौकरी में बिताया गया समय पेंशन के लिए गिना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में क्या फैसला किया?
केस है Chhaganbhai Kohyabhai Pateliya v. The State of Gujarat & Anr., जो बेंच ने सुना — Sanjay Kumar और Sanjeev Sachdeva — और फैसला दिनांक 6 October 2026 को आया (C.A. No. 13454 of 2026, 2026 INSC 1088).
कोर्ट ने कहा कि जो अपीलेंट लंबे समय से सर्विस कर रहे डेली-वेज़ स्किल्ड वर्कर्स थे और जिन्हें 1988 की सरकारी संकल्प के तहत स्थायी माना गया था, उन्हें सिर्फ इसलिए “डेली वेजर” कहकर increment का लाभ नहीं रोका जा सकता। चूँकि वह संकल्प उन्हें वेतन और पेंशन के मामले में स्थायी मानता था, इसलिए C.P. Mundinamani के नियम उन पर लागू होते हैं।
कोर्ट ने पहले दिए गए संशोधित दिशा-निर्देश भी लागू किए कि किस हद तक पिछली रकम में एक increment शामिल करके पेंशन बढ़ाई जाएगी। अपीलेंट्स ने अपनी रिट याचिका 2022 में दायर की थी, तो वे उस क्लॉज में आते हैं जो रिट याचिका दायर होने के महीने से पहले के तीन सालों के लिए एक increment शामिल करने की अनुमति देता है। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी हर अपीलेंट का केस जाँचे, संशोधित दिशा के अनुसार देय राशि निकालें, और 30 दिनों के भीतर रकम रिलीज़ करें। अगर 30 दिनों में पेमेंट नहीं हुई तो 30 दिनों के बाद से भुगतान तक 6% प्रति annum की दर से ब्याज लगेगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि एक अलग फैसले में उसने सामान्यतः एरियर्स पर ब्याज नहीं देने का नियम रखा था, लेकिन यह भी जोर दिया कि कोर्ट या ट्रिब्यूनल के टाइम-लिमिट का पालन किया जाना चाहिए; अगर अधिकारी समय पर नहीं देते तो यहां जैसा आदेश हुआ है वैसा ब्याज देना होगा।
आम लोगों और नौकरी-नियोक्ता के लिए इसका मतलब क्या है?
- जिन लंबे समय से काम करने वाले डेली-वेज़ स्किल्ड वर्कर्स को 1988 के सरकारी संकल्प के तहत स्थायी माना गया था, उन्हें रिटायरमेंट के ठीक बाद आने वाली increment का लाभ मिल सकता है और वो पेंशन व रिटायरल बेनिफिट में गिनी जाएगी।
- अगर रिटायर कर्मचारी ने कोर्ट में रिट याचिका पहले दायर कर रखी थी तो एक increment गिनकर बढ़ी हुई पेंशन सीमित समय तक पिछे के तीन सालों तक मिल सकती है (यहां कोर्ट ने 2022 में दायर याचिका पर तीन साल पीछे तक लागू किया)।
- स्टेट अथॉरिटीज़ को हर रिटायर कर्मचारी की फाइल चेक करनी होगी, पेंशन और दूसरे बेनिफिट्स फिर से हिसाब करने होंगे और बकाया भरना होगा। कोर्ट ने 30 दिनों के भीतर पेमेंट का आदेश दिया है और देर होने पर 6% सालाना ब्याज लगेगा।
यह प्रक्रिया कितनी जल्दी पूरी होगी?
सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे जाँच, हिसाब-किताब और पेमेंट 30 दिनों के भीतर पूरा करें। अगर 30 दिनों में पेमेंट नहीं हुई तो उस तारीख के बाद से भुगतान तक 6% प्रति वर्ष ब्याज देना होगा।
मुख्य बातें
- 17 October 1988 की एक सरकारी संकल्प ने कुछ लंबे समय के डेली-वेज़ स्किल्ड वर्कर्स को वेतन और पेंशन के लिए स्थायी माना था। वे पोस्ट-रिटायरमेंट increment के लिए क्वालिफाई कर सकते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले फैसलों को लागू किया और उन लोगों के लिए एक increment शामिल करके बढ़ी हुई पेंशन मान्यता दी, जहाँ रिट याचिका के आधार पर तीन साल पीछे तक का हिसाब लागू हुआ (यहाँ रिट याचिका 2022 में दायर थी)।
- अधिकारियों को एरियर्स का हिसाब करके 30 दिनों में भुगतान करना होगा; देर होने पर 6% p.a. ब्याज देय होगा।
- केस: Chhaganbhai Kohyabhai Pateliya v. The State of Gujarat & Anr., C.A. No. 13454 of 2026, 2026 INSC 1088 (बेंच: संजय कुमार और संजीव सचदेव, JJ.).
स्रोत: Supreme Court of India (official judgment) (नए टैब में खुलता है) · Chhaganbhai Kohyabhai Pateliya v. The State of Gujarat & Anr., C.A. No. 13454 of 2026, 2026 INSC 1088