क्या धोखेबाज़ क्रेडिटर से दिवाला (CIRP) शुरू हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई ऑपरेशनल क्रेडिटर धोखे में या मिल‑मिलाकर याचिका लाया हो तो ट्राइब्यूनल उस धारा 9 की एडमिशन को रद्द कर सकता है। लेकिन कोर्ट ने यह भी कहा कि कई बार CIRP जारी रखा जा सकता है क्योंकि यह कई अन्य लेनदारों और हितधारकों को प्रभावित करता है।

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Legum Pacific ·

मान लीजिए किसी हाउसिंग प्रोजेक्ट की कामकाजी रफ्तार रुक जाती है और एक छोटा ठेकेदार दिवाला के लिए याचिका दाखिल कर देता है। घर खरीदार, बैंक और सप्लायर्स यह सोचते हैं कि क्या उस दिवाला केस का इस्तेमाल दूसरे इलाजों (remedies) को रोकने के लिए किया जा सकता है।

कानून क्या कहता है?

धारा 9, दिवाला और दिवालियापन संहिता, 2016 (Insolvency and Bankruptcy Code, 2016) के तहत एक ऑपरेशनल क्रेडिटर (जैसे ठेकेदार या सप्लायर) डिफॉल्ट होने पर कंपनी के खिलाफ कॉर्पोरेट इंसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) शुरू कर सकता है। जब ट्राइब्यूनल धारा 9 की याचिका को स्वीकार करता है तो CIRP शुरू हो जाता है। एडमिशन के साथ मोराटोरियम आता है और कंपनी का नियंत्रण एक इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल (IRP/RP) के पास चला जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने समझाया कि किसी ‘कर्ज’ (debt) का होना एक जुरिस्डिक्शनल फैक्ट यानी अधिकार से जुड़ा मूल तथ्य है। ट्राइब्यूनल को यह संतुष्ट होना चाहिए कि यह आधारभूत तथ्य मौजूद है, तभी वह अपना अधिकार लगा सकता है। अगर याचिका धोखे से या कंपनी के साथ सांठ‑गांठ करके दाखिल की गई थी, तो ट्राइब्यूनल का अधिकार झूठी नींव पर लागू हुआ हो सकता है।

पब्लिक‑लॉ के मामलों में धोखा या मिल‑मिलाव निजी कारोबार के फ्रॉड से अलग होता है। सार्वजनिक मामलों में वो धोखा जो ट्राइब्यूनल को गुमराह करे, फैसले की प्रक्रिया को दूषित कर देता है। जब ऐसा धोखा ट्राइब्यूनल को वह अधिकार लगाने पर मजबूर करे जो उसे नहीं मिलना चाहिए था, तब एडमिशन को खारिज किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

In the Greenopolis appeals में ट्राइब्यूनल (NCLT) ने ऑपरेशनल क्रेडिटर और कॉर्पोरेट डेब्टर के बीच सक्रिय सांठ‑गांठ पाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Adjudicating Authority के पास यह शक्ति और अधिकार है कि वह CIRP को रद्द कर दे, यानी धारा 9 की याचिका को खारिज कर दे, अगर याचिका किसी मिलीजुली ऑपरेशनल क्रेडिटर के दावे पर मंजूर की गई थी।

कोर्ट ने यह भी जोर दिया कि एक बार याचिका स्वीकार हो जाने पर CIRP की प्रकृति बदल जाती है। एडमिशन के बाद प्रक्रिया in rem बन जाती है — इसका असर दिवालियापन संपत्ति और सभी लेनदारों पर होता है। कोड के नियम — मोराटोरियम, मैनेजमेंट का IRP के पास जाना, क्लेम आमंत्रित और वेरिफाई करना, और कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स बनाना — दिखाते हैं कि यह प्रक्रिया अब सिर्फ याचिकाकर्ता और डेब्टर के बीच का निजी झगड़ा नहीं रहती।

क्योंकि CIRP कई स्टेकहोल्डर्स को प्रभावित करता है, कोर्ट ने कहा कि आरम्भिक चरण में धोखे का पता चलने पर भी यह खुद‑ब‑खुद CIRP को रोकने का कारण नहीं बनता। Adjudicating Authority, प्रक्रियागत स्टेज, रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल और कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स की स्थिति, और दूसरे लेनदारों के हितों को देखकर तय करेगी कि CIRP जारी रहे या रद्द हो।

कोर्ट ने यह भी लिखा कि उसे प्रोजेक्ट की मालिकाना हक और नियंत्रण से जुड़े कुछ मुद्दे तय करने के लिए नहीं बुलाया गया था, इसलिए उन पर कोई फैसला नहीं दिया गया।

आम लोगों और व्यवसायों के लिए इसका क्या मतलब है?

अगर आप घर खरीदार हैं, सप्लायर हैं या बैंक हैं और आपका क्लेम है, तो आपकी स्थिति धारा 9 की याचिका के एडमिशन के बाद बदल सकती है। अगर बाद में पता चले कि याचिका धोखे या सांठ‑गांठ से लाई गई थी, तो ट्राइब्यूनल एडमिशन को रद्द कर सकता है। लेकिन ट्राइब्यूनल यह भी देखेगा कि CIRP रोकने से सभी लेनदारों और अन्य हितधारकों का सामूहिक हित प्रभावित तो नहीं होगा।

जो दावे पहले से रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल के सामने रखे जा चुके हैं और CIRP में जो कदम उठाए जा चुके हैं, वे उस फैसले में मायने रखेंगे। कोड इस प्रक्रिया को एक सामूहिक तरीका मानता है ताकि लेनदारों के लिए वैल्यू अधिकतम हो, न कि केवल याचिकाकर्ता की निजी लड़ाई बन जाए।

मुख्य बातें

  • अगर धारा 9 की याचिका धोखे या सांठ‑गांठ से प्रेरित थी तो ट्राइब्यूनल एडमिशन को रद्द कर सकता है।
  • आरम्भिक चरण में धोखे का पता चलने पर CIRP अपने आप खत्म नहीं हो जाता; ट्राइब्यूनल उपयुक्त मामलों में प्रक्रिया जारी रखने का फैसला कर सकता है।
  • एडमिशन के बाद CIRP एक in rem प्रक्रिया बन जाती है, जिसमें कई लेनदार, IRP/RP और कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स शामिल होते हैं; आरम्भिक क्रेडिटर अब प्रक्रिया का नियंत्रक नहीं रहता।
  • Adjudicating Authority CIRP के स्टेज, दूसरे लेनदारों के हित और कानूनी समाधान की संभावना देखकर तय करेगी कि प्रक्रिया जारी रहे या रद्द हो।

स्रोत: Supreme Court of India (official judgment) (नए टैब में खुलता है) · Greenopolis Welfare Confederation v. Rakesh Kumar Gupta, C.A. Nos. 6792-6796 of 2023, 2026 INSC 1070

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